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संजय और वो।

एक छोटा सा कमरा जिसमें एक सत्ताईस-अट्ठाइस साल का लड़का फ़ोन पर बातें कर रहा था। एक 6×4 की चारपाई पर लेटा हुआ था। सितम्बर का महीना था लेकिन पहाड़ों में ठंड का बढ़ जाना आम बात है इसीलिए शायद उसने भी एक रजाई ली हुई थी। रात के साढ़े ग्यारह बज रहे थे। कमरे में लाइट बन्द थी। कमरे वैसे तो दो थे लेकिन जिस कमरे में लड़का लेटा हुआ था उसमें बस एक चारपाई थी जो कि दीवार से सटी हुयी थी और कमरे में कीलों पर टँगे उसके कुछ कपड़े भर थे और हर जगह बस किताबें ही किताबें थी। शायद लड़का पढ़ाई करता था।
संजय काफी देर से बात किये जा रहा था और अब उसे थकान लगने लगी थी वो फ़ोन कभी दाएं कान से बाएं कान तक ले जाता कभी फिर से दाएं कान पर रख ले रहा था।
बीच बीच में वो अपना फोन भी देख रहा था शायद फ़ोन की बैटरी अब खत्म होने की कगार पर थी या उसे अधिक समय होने की चिंता हो गयी थी।
"अच्छा रिया कल बात करते हैं मुझे नींद आ रही है और मैं थोड़ा थक भी चुका हूँ।"

"अरे तुम समझती क्यों नहीं हो?"

"अरे नहीं बाबा बस नींद आ रही है।"

"नहीं तुम्हारी बातें सुनकर क्यों आएगी नींद?"

"अरे इतना पढ़ा है और दिन भर काम भी था तो थकान लग रही है।"

"अरे यार मैंने ऐसा कब कहा?"

"अरे…."

"अरे मगर…."

"ओफ्फो काट दिया फ़ोन चलो कोई बात नहीं।"
इतना कहकर बड़बड़ाते हुए संजय ने अपना फोन किनारे रख दिया और वो नींद लेने की कोशिश करने लगा।
इधर उधर भटकने के बाद उसको नींद आ गयी।

"खट….."
"खट…."
खट की आवाज से उसकी नींद खुली। ये आवाज शायद कमरे की खिड़कियों के दरवाजे की कुंडी खुलने से आयी है ऐसा सोचकर वो खिड़की की ओर गया और पाया कि कुंडी बिल्कुल सही से बन्द थी।

वो चुपचाप बिस्तर पर आकर लेट गया। उसने फिर से सोने की कोशिश की लेकिन उसे नींद नहीं आ रही थी।

दस पंद्रह मिनट बाद फिर से वही खट खट की आवाज ने उसका ध्यान टूटा उसने इधर उधर देखने की कोशिश की लेकिन अँधेरा इतना था कि वो कुछ देख नहीं पाया उसने अभी तक लाइट नहीं जलायी थी क्योंकि उसे अपनी खिड़की का रास्ता पता था खिड़की की महीन दरारों से आ रही हल्की रोशनी ने उसका काम आसान कर दिया था मगर अब रोशनी करनी आवश्यक हो गयी थी।
उसने अपना फोन ऑन किया तो देखा कि रात के ढाई बज चुके थे। उसने फ़ोन की टॉर्च जलायी तो रोशनी हुई और उसने बल्ब जलाया।
फ़ोन की बैटरी सात प्रतिशत ही बाकी थी इसीलिए उसने अधिक देर टॉर्च जलाना उचित नहीं समझा।

उसका मन नहीं था कि वो बाहर झाँके लेकिन उत्सुकता इतनी थी कि वो खुद को रोक नहीं पाया और उसने दरवाजा खोलकर बाहर झाँका तो अंधकार में उसके कमरे के बाहर अनार का पेड़, बरामदा और अनार के पेड़ के अगल बगल उग आयी झाड़ियों के अलावा कुछ भी नहीं था और कीड़ों की आवाज के अलावा कुछ नहीं था।
थके मन से संजय ने दरवाजा बंद किया। आँखों को मलता हुआ वो पीछे पलटा तो अचानक एक काले लबादे में लिपटा एक लंबे काले बालों में सफेद चेहरे और बड़ी बड़ी लाल आँखों वाली आकृति उसके सामने थी। संजय अचानक उसको देखकर पीछे बंद दरवाजे से भिड़ गया और जमीन और गिर गया। गिरकर उसने अपनी नजर उठायी तो वहाँ कोई नहीं था। उसने जैसे तैसे खुद को संभाला और उसने लाइट बंद की और बिजली की गति से अपने बिस्तर पर लेट गया। उसकी नींद अब गायब थी और होती भी क्यों ना।

चारों तरफ से अपनी रजाई से उसने अब खुद को घेर लिया और अपना सिर भी रजाई के अंदर कर दिया। वो समझ नहीं पा रहा था कि उसने क्या देखा है अभी अभी।

"संजय…."

एक फुसफुसाहट वाली आवाज उसको सुनायी दी। उसने खुद को और मजबूती से रजाई के साथ गांठ दिया। दोनों हाथों से रजाई को इस तरह पकड़ दिया था कि उसे शायद ही कोई दूर कर पाता।

"संजय…"
"संजय…"
"संजय…."
"संजय…."
"संजय…."

एक के बाद एक बहुत जल्दी जल्दी फुसफुसाहट से वह आवाज संजय को पुकार रही थी।

संजय को लगा जैसे आज वो गया। संजय ने अब तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी थी।
अचानक संजय को वह स्वर बिल्कुल अपने कान के नजदीक सुनायी दिया।

"संजय…"

संजय अब भी चुप लेटा हुआ था।

अप्रत्याशित रूप से वो आवाज जोर से चिल्लाई।

"संजय…….."

संजय की रजाई उससे छिटककर दूर गिर गयी। संजय हड़बड़ाहट में रजाई को समेटकर ऊपर बिस्तर पर दोबारा लेट गया।

"हीही ही ही ही ही……"
वातावरण में एक अजीब सी हँसी फैल गयी। संजय की डर के मारे हालत खराब हो चुकी थी। उसकी स्थिति काटो तो खून नहीं वाली हो गयी थी।

कुछ देर फिर से सन्नाटा छा गया। सब कुछ सामान्य सा लगने लगा था।
संजय की जान में जान वापस आ रही थी।
तभी….

भटाक की आवाज से दरवाजा खुल गया। संजय ने एकदम से अपने सिर पर से रजाई हटायी और बाहर दरवाजे की तरफ देखा तो दरवाजा नॉर्मल था।

"ही ही ही ही ही ही ही ही….."

फिर खौफनाक हँसी कमरे में गूँज गयी और संजय फिर से रजाई में सिर घुसेड़ चुका था।

"संजय…."

"ओ संजय…. बाहर देख कितना सुहाना मौसम है बाहर आ…."

"संजय सुन तो …"

फिर से फुसफुसाहट की आवाज उसे सुनायी दे रही थी। उसने ठान लिया था कि अब वो बाहर नहीं देखेगा बिल्कुल भी नहीं।
उसने और जोर से अपने सिर के नीचे रजाई को दबा दिया।

"संजय…"

फिर एक जोरदार आवाज हुयी और संजय घिसटता हुआ दरवाजे पर पहुँच चुका था दरवाजा हांलाकि बन्द था। संजय कुछ समझ नहीं पाया।

अचानक दरवाजे में दस्तक हुयी।

"कोई है?"

"बोलो ना कोई है?"

"मैंने तो देखा अभी कोई तो है…."

आवाज अलग अलग तरह से आ रही थी। संजय अपनी जगह पर जड़ हो चुका था। उसको समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे।

"मैं अंदर आऊँ?'

"ना…"
"ना…
"ना….ना….ना"
"मैं नहीं…."

"तू…."
आवाज के इतना कहते ही दरवाजा खुला और संजय तेजी से घिसटता हुआ अनार के पेड़ पर टकराया उसके सिर से खून निकलने लगा था।
उसने इधर उधर नजर दौड़ायी लेकिन कोई नहीं था।

"किसे ढूंढ रहे हो मुझे?"

संजय ने आवाज की दिशा में अपनी गर्दन घुमायी तो आवाज अनार के पेड़ के ऊपर से आ रही थी।
एक अजीब सा साया वही जो अंदर देखा था वही साया पेड़ से उल्टा नीचे उतर रहा था और केवल "संजय… संजय…"
मद्धम आवाज में बोल रहा था।
सनजय उसको देख रहा था कि वो अचानक से संजय के चेहरे पर आया और संजय की आँखे बंद हो गयी।
और उसने जब आँख खोली तो वहाँ कोई नहीं था। था तो बस सन्नाटा वो एकदम से बिना कुछ सोचे समझे कमरे की तरफ दौड़ पड़ा और दरवाजा बंद करके रजाई के अंदर सो गया।

पंद्रह बीस मिनट बाद फिर वही आवाज

"संजय…."

सुनायी दी संजय नींद ना आने की वजह से परेशान था और ऊपर से ये सब उसका दिमाग अपने काबू से बाहर हो रहा था। धीरे धीरे उसका गुस्सा गायब हो रहा था। वो शांत पड़ रहा था बिल्कुल शांत।

तभी

"संजय…."

एक भयंकर आवाज जोर से चिल्लायी और संजय खुद पर काबू ना रख सका और एकदम से रजाई हटाते हुए दरवाजे की तरफ कूद पड़ा।
उसका गुस्सा बहुत ज्यादा था।

"ही ही ही ही ही ही ….."

आवाज निरंतर हो रही थी संजय बहुत कुपित हो चुका था। उसने थक हारकर पीछे चारपाई की तरफ कदम बढ़ाए तो वहाँ संजय लेटा हुआ था।




*************समाप्त*************


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3 Comments

Shalini Sharma

17-Sep-2021 03:11 PM

बहुत ही अच्छे तरीके से दर्शाया गया है जैसे सब कुछ सच में हो रहाvery nice

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Apeksha Mittal

16-Sep-2021 12:37 PM

पढ़ कर मज़ा आया , अच्छी बात है रात में नही पढ़ी ,😊😊😊😊

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Shaba

16-Sep-2021 12:36 PM

और खून हो गया। संजय के साथ हमारे रात की सूकून भरी नींद का भी। बहुत ही डरावना अहसास था।

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